
दुनिया अभी रूस-यूक्रेन और मिडिल ईस्ट की हलचल से उबरी भी नहीं थी कि South Asia में नया episode शुरू हो गया। इस बार स्क्रिप्ट में दो मुस्लिम पड़ोसी पाकिस्तान और अफगानिस्तान। आरोप-प्रत्यारोप, एयरस्ट्राइक, बॉर्डर पोस्ट पर हमले और टीवी डिबेट्स में ऊंची आवाज़ें… माहौल पूरी तरह “War Mode” में दिख रहा है।
लेकिन सवाल वही असल चिंगारी किसने लगाई?
TTP फैक्टर: जंग की पहली चिंगारी
पाकिस्तान का साफ आरोप है कि अफगान धरती से Tehreek-e-Taliban Pakistan (TTP) के लड़ाके पाकिस्तान में हमले कर रहे हैं। सैनिक और नागरिक दोनों निशाने पर रहे हैं। इस पर इस्लामाबाद का कहना है कि उसने काबुल से कई बार कार्रवाई की मांग की, लेकिन “Action Less, Assurance More” वाली स्थिति बनी रही।
आख़िरकार पाकिस्तान ने एयरस्ट्राइक की। दावा टारगेट सिर्फ आतंकी ठिकाने। अफगानिस्तान का जवाब “यह हमारी संप्रभुता पर हमला है।”
कहानी यहीं से escalation की तरफ मुड़ गई।
अफगानिस्तान का पलटवार: संप्रभुता बनाम सुरक्षा
तालिबान सरकार का कहना है कि उसकी जमीन से किसी भी देश के खिलाफ आतंकी गतिविधियों की इजाज़त नहीं है। लेकिन पाकिस्तान के लिए सवाल है “अगर नहीं है, तो हमले हो कैसे रहे हैं?”
अफगान पक्ष का दावा है कि पाकिस्तानी हमलों में आम नागरिक भी मारे गए। इसके बाद सीमा चौकियों पर जवाबी कार्रवाई हुई। यानी एयर से ग्राउंड तक, बयान से बुलेट तक मामला पहुंच चुका है।

डूरंड लाइन: सौ साल पुराना जख्म, आज भी ताज़ा
असल में यह टकराव सिर्फ TTP तक सीमित नहीं है। जड़ें कहीं गहरी हैं Durand Line में। ब्रिटिश दौर में खींची गई यह सीमा आज भी अफगानिस्तान औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं करता। सीमा के दोनों तरफ एक जैसे कबीले, रिश्तेदार और लोकल नेटवर्क हैं। आवाजाही आम है। ऐसे में militancy और infiltration को रोकना किसी chessboard जैसा सीधा नहीं।
तालिबान के 2021 में सत्ता में आने के बाद पाकिस्तान को उम्मीद थी कि हालात सुधरेंगे। हुआ उल्टा TTP हमले बढ़ गए। यानी दोस्ती की उम्मीद, सुरक्षा की चुनौती में बदल गई।
असली गेम क्या है?
यह जंग सिर्फ बॉर्डर पोस्ट या एयरस्ट्राइक की नहीं है। यह है Internal security vs regional influence, Sovereignty vs strategic depth, Narrative war vs ground reality और सबसे बड़ा सवाल क्या यह Full-Scale War बनेगी या Tactical Pressure Game ही रहेगी?
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर दोनों तरफ से “Cooling Mechanism” नहीं अपनाया गया तो South Asia की stability पर बड़ा असर पड़ सकता है। क्योंकि यह इलाका पहले ही geopolitics का pressure cooker है।
बारूद से ज्यादा खतरनाक है अविश्वास
सीमा पर तैनात सैनिकों से ज्यादा गरम बयानबाज़ी है। असली खतरा यह है कि mistrust की दीवार ऊंची होती जा रही है। और इतिहास गवाह है जब diplomacy fail होती है, तो artillery बोलती है। फिलहाल दोनों देशों के पास विकल्प हैं बातचीत या बढ़ता टकराव। देखना होगा अगला कदम कौन सा चुना जाता है।
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